आज के डिजिटल दौर में बच्चों की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। जहां पहले कभी खाली समय में बच्चे मैदानों में क्रिकेट, कबड्डी या गिट्टे खेलते थे, दोस्तों के साथ गप्पे मारते थे। आज वही समय मोबाइल फोन, टैबलेट और कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बीत रहा है। ये बेहर गंभीर समस्या है कि बच्चे पढ़ाई के अलावा कुछ कर रहे हैं तो वो मोबाइल स्क्रीन पर गेमिंग है। ऑनलाइन गेमिंग अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गई है, बल्कि कई बच्चों के लिए यह एक आदत से बढ़कर लत बनती जा रही है। सवाल ये है कि आखिर बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग की लत क्यों लग रही है और इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हैं ? 

 

स्मार्टफोन और सस्ती इंटरनेट सुविधा 

 

ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत का सबसे बड़ा कारण स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की आसान उपलब्धता है। आज लगभग हर घर में स्मार्टफोन मौजूद है और बच्चों के हाथों में भी मोबाइल बहुत कम उम्र में ही थमा दिया जाता है। ये उनके अभिभावकों की गलती है। पहले जहां इंटरनेट सीमित और महंगा था, अब सस्ते डेटा पैक ने हर उम्र के ऑनलाइन गेमिंग की लत का सबसे बड़ा कारण स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की आसान उपलब्धता है। आज हर घर में स्मार्टफोन मौजूद है और बच्चों के हाथों में भी मोबाइल बहुत कम उम्र में ही थमा दिया जाता है। 

 

पहले जहां इंटरनेट सीमित और महंगा था, अब सस्ते डेटा पैक ने हर उम्र के व्यक्ति को 24 घंटे ऑनलाइन रहने की सुविधा दे दी है। ऐसे में बच्चे अपने माता-पिता का फोन लेकर आसानी से गेम डाउनलोड कर लेते हैं और घंटों उसी में डूबे रहते हैं। यहीं कारण है कि बच्चों को अब कम उम्र में चश्मा भी लग जाता है। गेम्स का आकर्षक डिजाइन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव ऑनलाइन गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे खिलाड़ियों को बार-बार खेलने के लिए प्रेरित करे। रंग-बिराफ ग्राफिक्स, रोमांचक साउंड इफेक्ट्स, लेवल पूरा करने पर मिलने वाले रिवॉर्ड्स और पॉइंट्स बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। 

 

पढ़ाई और खेलकूद का दबाव भी

 

आज के प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में बच्चों पर पढ़ाई का बहुत दबाव है। स्कूल, कोचिंग, होमवर्क, और एग्जाम का दबाव बच्चों को मानसिक रूप से थका देता है। ऐसे में ऑनलाइन गेमिंग उन्हें तनाव से राहत का आसान स्रोत लगती है। गेम खेलते समय वे वास्तविक दुनिया की चिंताओं से दूर चले जाते हैं। यही वजह है कि बच्चे पढ़ाई से बचने या मन बहलाने के लिए गेमिंग की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं। खास बात तो ये है कि आज अभिभावकों के पास भी इतना समय नहीं होता कि उनसे बैठकर बातें करें। ऐसे में ऑनलाइन गेमिंग की लत लगना लाजमी तो हैं ही। 

 

माता-पिता की व्यस्तता और निगरानी की कमी 

 

कई परिवारों में माता-पिता दोनों ही काम करते हैं। बच्चों के साथ समय बिताने और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का समय न के बरामबर ही मिल पाता है। ऐसे में मोबाइल फोन बच्चों के लिए एक डिजिटल बेबीसिटर बन जाता है। शुरुआत में माता-पिता इसे सुरक्षित और आसान समाधान मानते हैं, लेकिन धीरे-धीरे बच्चे घंटों मोबाइल पर गेम खेलने लगते हैं। समय रहते यदि निगरानी न हो, तो यही आदत लत में बदल जाती है। 

 

सोशल कम्युनिकेशन की कमी 

 

आधुनिक जीवनशैली और शहरीकरण के कारण बच्चों के खेलने के मैदान कम होते जा रहे हैं। अपार्टमेंट संस्कृति, ट्रैफिक और सुरक्षा की चिंताओं के कारण बच्चे बाहर कम निकलते हैं। दोस्तों के साथ मिलने-जुलने के मौके भी सीमित हो गए हैं। ऐसे में ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के लिए सामाजिक संपर्क का एक विकल्प बन जाती है, जहां वे वर्चुअल विश्व में दूसरे खिलाड़ियों से जुड़ते हैं और खुद को अकेला महसूस नहीं करते। 

 

कोविड के बाद बढ़ा ऑनलाइन गेमिंग का क्रेज

 

                             Image Credit: Canva 

 

 

ऑनलाइन गेमिंग का क्रेज कोविड महामारी के बाद और भी ज्यादा बढ़ गया। जब स्कूलों के सारे क्लेसेज ऑनलाइन फोन पर लिए जाते थे तो बच्चों के हाथों में फोन थमाना अभिभावकों की मजबूरी बन गई। यहीं आदत आगे चलकर मोबाइल की तल में अब तब्दील हो चुकी है। पढ़ाई के नाम पर मोबाइल और लैपटॉप का उपयोग बढ़ा और इसी समय के दौरान कई बच्चे ऑनलाइन गेम्स के संपर्क में आए। लॉकडाउन के समय बाहर खेलने की मनाही ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया। 

 

बच्चों की सेहत हो रही खराब 

 

ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से प्रभावित कर सकती है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों की समस्याएं, सिरदर्द, नींद की कमी और मोटापा बढ़ सकता है। मानसिक रूप से बच्चे चिड़चिड़े और आक्रामक है। 

 

ऑनलाइन गेमिंग की लत ऐसे छुड़वाएं

 

ऑनलाइन गेमिंग को पूरी तरह से रोकना शायद संभव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करनी चाहिए और उनके लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करनी चाहिए। बच्चों को खेलकूद, संगीत, पेंटिंग जैसी रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है। स्कूलों को भी डिजिटल जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए।

 

ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन जब यह बच्चों की दिनचर्या और भविष्य को प्रभावित करने लगे, तब चिंता का विषय बन जाती है। तकनीक का सही और संतुलित उपयोग ही इसका समाधान है। बच्चों क ऑनलाइन गेमिंग कुछ ऐसा नहीं है जो बच्चों को नुकसान पहुँचाता हो, लेकिन जब यह उनकी दिनचर्या और भविष्य को प्रभावित करने लगी, तो यह चिंता का विषय बन गई। तकनीक का सही उपयोग ही इसका समाधान है। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि डिजिटल दुनिया के साथ-साथ वास्तविक दुनिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 

 

बात बस इतनी-सी है कि हमें बच्चों को फोन तो देना है लेकिन उन्हें बाहरी गेम और लोगों से मेल मिलाप करने के लिए प्रेरित भी करना है। अगर बच्चे सिर्फ ऑनलाइन गेम में समय बिताएंगे तो उनका मानसिक, सामाजिक और शारीरिक विकास कही न कही अधूरा ही रह जाएगा। ये उनके भविष्य के लिए सही नहीं है। अपने बच्चों को मोबाइल उपयोग करने का महत्व भी बताएं लेकिन क्वालिटी टाइम बिताना, लोगों के साथ बातें करने के महत्व को भी समझाएं।