हमेशा से माता-पिता को सबसे पहला शिक्षक और मार्गदर्शक माना जाता है। सनातन धर्म में मान्यता है कि माता-पिता के का प्रभाव केवल उनके अपने जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि संतानों के जीवन पर भी पड़ता है। ये बात खुद प्रेमानंद जी महाराज ने भी अपने भक्तों को समझाते हुए बताया। वृंदावन के विख्यात संत स्वामी प्रेमानंद जी महाराज ने इसी विषय पर अपना गहरा आध्यात्मिक दृष्टिकोण साझा किया है, जो आज के समय में प्रसार के कारण हर घर में चर्चा का विषय बन रहा है।
हमारा कर्म सिर्फ व्यक्तिगत प्रभाव नहीं डालता
रोजमर्रा की जिंदगी में जो भी हम कर्म करते हैं उसका प्रभाव हमारे जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि हमारे संतान के जीवन को भी प्रभावित करता है। प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि माता-पिता के कर्म केवल व्यक्तिगत परिणाम नहीं लाते बल्कि उनके फैसले, आचरण और जीवन के विकल्प सीधे तौर पर उनके बच्चों के भविष्य पर किस्मत पर असर डालते हैं। वे कहते हैं कि जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों को जन्म, संस्कार, शिक्षा और संसाधन देते हैं। ठीक उसी तरह माता-पिता के कर्मों का प्रभाव उनकी संतान को भी प्राप्त होता है। फिर चाहे वो कर्म सकारात्मक हो या नकारात्मक। असर तो आपके संतान पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए अगर माता-पिता दूसरों के साथ दया, सेवा, सत्य और नैतिकता से पेश आ रहे हैं, तो इस आचरण का प्रभाव बच्चे के भीतर सकारात्मक रूप से विकसित होता है। जिसका आगे चलकर उनको फायदा होगा। उनका भविष्य उजागर होगा। दूसरी तरफ, अगर माता-पिता का जीवन झूठ, अहंकार या नकारात्मक कर्मों से भरा है, तो बच्चों के जीवन में भी परेशानियां और नैतिक संघर्ष पैदा हो सकते हैं।
जीवन में संस्कारों का है खूब महत्व
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि इंसान के जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व है। हमारे अच्छे संस्कार हमारे जीवन को सरल बनाते हैं, ये आगे चलकर हमे खुश रखते हैं और मन को तृप्ति प्रदान करते हैं लेकिन वहीं हमारे बुरे संस्कार हमारे जीवन को कठीनाइयों से भर देते हैं। संस्कार वे मूल्य, आदर्श, जीवन दृष्टि, नैतिकता होते हैं जो छोटे-छोटे अनुभवों के जरिए बच्चों के मन में जन्म लेते हैं।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि एक अच्छआ इंसान बनने के लिए केवल पढ़ाई-लिखाई ही पर्याप्त नहीं है। अगर बच्चे में मानवता, नैतिकता और आचार-संहिता का विकास नहीं होता, तो ऊंची शिक्षा भी उसे सही मार्ग नहीं दिखा पाएगी। आजकल बच्चों के व्यवहार में संस्कार की कमी है। ये आज के बच्चों को उनके जीवन के वास्तविक लक्ष्यों से दूर कर देती है, जिससे समय के साथ मानसिक अस्थिरता, भावनात्मक असंतुलन और जीवन में उद्देश्यहीनता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
संतान भी भुगतती हैं आपके कर्मों का फल
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि आपकी संतान आगे चलकर आपके कर्मों का फल भुगतेदी। ऐसे में जो भी कर्म करें एक बार सोच समझकर करें। ये आपके बच्चे के जीवन को बना सकती है या फिर आपके कर्म ही आपके बच्चे के जीवन को बर्बाद भी कर सकते हैं। माता-पिता का व्यवहार बच्चों के मनोविकास और चरित्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर माता-पिता अपने बच्चों के सामने रोजाना झूठ बोलते हैं, या विवाद करते हैं, तो इससे बच्चों में खौफ पैदा हो जाता है। ऐसे में उनका विकास रुक जाता है। इसी प्रकार अगर माता-पिता अपने जीवन में सत्य, धैर्य और प्रेम का प्रदर्शन करते हैं, तो बच्चे भी उन्हीं गुणों को आत्मसात करते हैं।
कर्मों से तय होती है भविष्य की दिशा
हम आज कैसा कर्म कर रहे हैं...इससे हमारे भविष्यकी दिशा का निर्धारण होता है। प्रेमानंद जी महाराज भी इसी सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। वे अपने भक्तों से अच्छे कर्म करने के लिए कहते हैं। वे यह भी बताते हैं कि अच्छे कर्मों से जन्म-जन्मांतर तक के प्रभाव को कम किया जा सकता है। वे नामजप, भजन-कीर्तन और सत्संग जैसी आध्यात्मिक गतिविधियों को कर्मों के प्रभाव को शुद्ध करने का सर्वोत्तम उपाय मानते हैं। वे ये भी कहते हैं कि हर व्यक्ति चाहे माता-पिता हो या अन्य कोई, अपने कर्म को सकारात्मक रखकर न केवल अपने लिए बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी सकारात्मक प्रभाव छेड़ता है। ऐसे में कर्मों को केवल स्वार्थपूर्ण न सोचकर समाज, परिवार और मानवता के कल्याण के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रेमानंद जी महाराज के सीख का सामाजिक महत्व
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद और समय देना महत्वपूर्ण है। लेकिन बुरी बात ये है कि उनके बीच संवाद और समय दोनों की कमी है। महाराज कहते हैं कि संवाद, समर्पण और सम्मान से ही परिवार में सच्चे रिश्तों की नींव मजबूत होती है। बच्चों को समय देना, उनके मन को भांपना...उनसे बातें करना, उनके साथ खाना खाना, उनके साथ खेलना जरूरी है। उन्होंने कई बार कहा है कि बच्चे केवल शिक्षा से नहीं, बल्कि मूल्यों और व्यवहार से सीखते हैं इसलिए माता-पिता को पहले अपने आचरण को सुधारना चाहिए।
संत का यह विचार आधुनिक समाज में बेहद प्रासंगिक है जहां पारिवारिक मूल्यों में कमी और व्यक्तिगत सफलता की दौड़ में रिश्तों की अहमियत को अक्सर नकार दिया जाता है। प्रेमानंद महाराज हमें याद दिलाते हैं कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल सामाजिक प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि मानसिक शांति, नैतिक संतुलन और पारिवारिक समर्थन में निहित है।









