आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी को शांति के दो पल बिताने की इच्छा है। लेकिन जिम्मेदारियां और काम के बोझ तले इंसान खुद के लिए चंद मिनट भी आज निकाल पाए...बहुत मुश्किल से संभव है। धार्मिक ग्रंथ न केवल हमारी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है बल्कि ये हमारे तन-मन को शांति प्रदान करता है। Anxiety और चिंता आज की आम समस्या बन चुकी है। हम दूसरे से अधिक अपेक्षाएं रखने लगे हैं जिस वजह से उनकी छोटी-छोटी बातें भी हमें बुरी लगने लगी है। रोजमर्रा की जिंदगी में कई चिंताएं हम पर घर कर गई हैं। कभी करियर की चिंता, कभी रिश्तों के बिगड़ते-बनते हालातों की चिंता, आर्थिक संकट की चिंता, सामाजिक अपेक्षाओं की चिंता करते-करते हम जिंदगी जीना छोड़ चुके हैं। ऐसे में इंसान को आज मदद की जरूरत है। वो मदद जो इंसान को खुश कर सके, उन्हें दुनिया की हर चिंताओं से दूर करके मानसिक शांति दे। बैचेन मन को एक सुकून भरी खुशी चाहिए...जो आज के समय में मिलना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं। गीता में लिखी बातें सुनकर और पढ़कर आपको Anxiety दूर करने में मदद मिलेगी। इस आर्टिकल में आज इसी बात पर चर्चा करने वाले हैं।
चिंता का एकमात्र कारण है भविष्य के बारे में सोचना
गीता में लिखा है कि हमारी चिंता का एकमात्र कारण यहीं है कि हम अपने भविष्य के बारे में सोचते रहने हैं और कहीं न कहीं आज को जीना भूल जाते हैं। ये देखना ही भूल जाते हैं कि आज जिस जिंदगी को हम साक्षात जी रहे हैं वो कितना खूबसूरत है। आज की अहमियत कर ही नहीं पाते। जिंदगी में जो पल आया ही नहीं बस उसके बारे में सोचते-सोचते आज को खोते जा रहे हैं। जिस वजह से Anxiety हमारे अंदर घर कर गई है। गीता में लिखा है कि युद्ध से पहले अर्जुन भविष्य में परिणामों की चिंता करते-करते ही अंदर से टूट जाता है। गीता सीखाती है कि जो अभी हमारे नियंत्रण में है उसपर फोकस करो। जब व्यक्ति वर्तमान में जीना सीख जाता है तो चिंता खुद-ब-खुद दूर हो जाती है।
फल की चिंता किए बिना कर्म करो
गीता कहती है कि फल की चिंता किए बिना कर्म करते जाओ। यहीं तो आपकी Anxiety के इलाज का मूल मंत्र है। आज हम मेहनत से ज्यादा अपने परिणामों को लेकर परेशान रहते हैं। जब व्यक्ति सचमुच ये समझ जाता है कि उसका अधिकार केवल प्रयास तक है न कि परिणाम तय करने तक तो मन का आधा से ज्यादा बोझ खत्म हो जाता है। असफल होने का डर ही खत्म हो जाता है। आपका आत्मविश्वास खुद-ब-खुद बढ़ने लगता है।
जो होना है वो होकर रहेगा
गीता हमें सिखाती है कि जो होना है वो होकर ही रहेगा उसपर किसी का बस नहीं है। सिर्फ मेहनत पर हमारा बस होता है और यहीं सभी समाधानों का मूल मंत्र है। बार-बार उन्हीं बातों को लेकर सोचते रहना मानसिक थकान पैदा करता है। जब आदमी अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करके उसे बदलने में प्रयासरत होता है तो Anxiety धीरे-धीरे कम हो जाती है।
मन ही सबसे बड़ा दुश्मन, मन ही शत्रु
गीता कहती है कि मन ही सबसे बड़ा शत्रु और मन ही सबसे बड़ा साथी है। अंतर सिर्फ इतना है कि आप मन में क्या-क्या सोचते हैं और क्या मानते हैं। अपने मन को कंट्रोल करना और मन को बेकाबू करना सब आपके हाथ में है। नेगेटिव सोचना, बार-बार उसे दोहराना, खुद को दोषी मानना ये सब Anxiety को बढ़ाते हैं। गीता आत्म-अनुशासन, अभ्यास और जागरूकता की बात करती है।
शरीर और मन की सीमाओं में न फंसे

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गीता कहता है कि हम केवल एक शरीर या मन मात्र नहीं बल्कि उससे परे एक चेतन आत्मा हैं। बता दें आपको कि Anxiety अकसर शरीर और मन की सीमाओं में फंसने से आती है। जब व्यक्ति खुद को परिस्थितियों का शिकार मानने लगता है तो वो Anxiety का शिकार हो जाता है।
ध्यान और संतुलित जीवन जीने की कला
गीता ध्यान, संयम और संतुलित दिनचर्या पर जोर देती है। बहुत ज्यादा काम, अनियमित नींद और असंतुलित जीवनशैली Anxiety को बढ़ाती है। गीता कहती है कि जो व्यक्ति संतुलित भोजन, सही विश्राम और मानसिक अनुशासन अपनाता है, उसका मन जल्दी विचलित नहीं होता। ये बात आज के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह से भी मिलती है।
विश्वास और समर्पण की भावना
गीता समय पर ईश्वर पर विश्वास करने को कहती है। साथ ही साथ लोगों के प्रति समर्पण की भावना को अपनाने पर जोर देती है। इससे मानसिक शांति मिलती है। जब व्यक्ति ये मान लेता है कि जीवन का कोई गहरा अर्थ है और वे अकेला नहीं है, तो Anxiety का भार हल्का हो जाता है।
Anxiety से दूर होना है बेहद जरूरी
आज खुद को एक बड़े मुकाम पर देखने के लिए Anxiety को खत्म करना ही पड़ेगा। इसके लिए हम गीता का सहारा ले सकते हैं। नियमित रूप से गीताका पाठ करें और इसमें लिखे शब्दों को समझने का प्रयास करें। इससे लड़ने के बजाय इसे समझें और इसे खत्म करें। ये ग्रंथ हमें आत्म शांति के लिए प्रेरित करती है। बताती है कि जो हो रहा है, जैसा भी हो रहा वो तुम्हारे अच्छे के लिए ही हो रहा है।
Anxiety कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन आज इसका रूप लगातार बदल रहा है। अगर गीता में लिखी इन बातों को अपना लिया जाए तो आधी से ज्यादा समस्या का समाधान तो हमारे सोचने मात्र से ही हो जाता है। ऐसे में कहा जा सकता है कि गीता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों साल पहले थी।









