04 December 2025
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जैन धर्म के साधु-साध्वी स्नान नहीं करते, वे अपने मन और विचारों की शुद्धि को जयादा प्राथमिकता देते हैं उनका मानना हैं कि नहाने से छोटे जीवों को नुकसान पहुंचता है..
आज हम आपको उन कारणों के बारे में बताएंगे जिनकी वजह से जैन साधु-संत स्नान नहीं करते और इस प्रथा के पीछे की मान्यता और भाव क्या है
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जैन धर्म में कई ऐसी प्रथाएं हैं जो न केवल आश्चर्यजनक हैं लेकिन जैन धर्म के लोगों के लिए बहुत महत्व रखती हैं। जैन धर्म दो संप्रदायों, एक श्वेतांबर और दूसरा दिगंबर में बंटा हुआ है। दोनों ही संप्रदायों में इन प्रथाओं का पूरी श्रद्धा से पालन किया जाता है। ।
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श्वेतांबर साधु-साध्वियाँ बदन पर एक पतला सूती वस्त्र का धारण करते हैं, वहीं दिगंबर बदन ढकने के लिए कुछ नहीं पहनते यानी नग्न रहते हैं। जैन धर्म के साधु-संत कभी स्नान नहीं करते, फिर भी उन्हें पवित्र माना जाता है। आइए जानते हैं इस परंपरा के बारे में
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जैन धर्म में साधु या साध्वी एक विचारधारा का पालन करते हैं कि शारीरिक शुद्धता मायने नहीं रखती, मन में शुद्ध और सात्विक विचार रखने से पूरा शरीर शुद्ध हो जाता है। शरीर को बाहर से साफ़ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है।
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उनके स्नान न करने के पीछे एक और कारण है। जैन साधुओं का मानना है कि स्नान करने से व्यक्ति के शरीर पर मौजुद जीवों का जीवन नष्ट हो जाता है । जैन धर्म में इसे पाप माना जाता है।
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शरीर को गीले कपड़े से पोंछना, मिट्टी का लेप लगाना, धूप में बैठना जैसे तरीकों का उपयोग करते हैं, स्नान न करने का निर्णय एक निजी फैसला है। यह उनकी धार्मिक आस्था और जीवनशैली पर आधारित है।
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दीक्षा लेने के बाद जैन साधु-साध्वी का पूरा जीवन सादगी से भरा होता है । जैन साधु-साध्वी हर तरह की सुविधा का त्याग कर देते हैं, बिस्तर, पंखा, जूते-चप्पल आदि जैसे चीजों का भी
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दस दिन के पर्युषण महापर्व का जैन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। पर्युषण महापर्व के दौरान जैन धर्म के लोग अपने आत्मचिंतन पर ध्यान एकत्रित करते हैं। जैन धर्म के साधु-साध्वी दीक्षा लेने के बाद बहुत ही कठोर जीवन बिताते हैं
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